Swami Rameshwranand Sarswati Ji Maharaj

new 9

महामंडलेश्वर पूज्य सतगुरुदेव श्री श्री 1008 बाल ब्रहमचारी बालसंत अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त स्वामी श्री रामेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज का जन्म बैशाख शुक्लपक्ष तिथि द्वादशी, हस्त नक्षत्र में २९ गते विक्रम सम्वत २०३० तदानुसार 13.05.1973, हिमालय की कंधराओं में पिता श्री त्रिलोचन शर्मा माता श्रीमती हरिकला देवी कौशिक गोत्रीय ब्रहाम्ण कुल में हुआ। 7 वर्ष की अवस्था थी। रविवार का दिन था। ज्येष्ठ 2 गते संवत 2037 के दिन अचानक उनके मन मेँ तरंग सी उठी। वह नदी के किनारे पहुँच गए। नदी के तट पर बैठे-बैठे अचानक अंतर मेँ ऐसा घटा कि कुछ तलाशने का भाव जागृत हुआ। घर परिवार का आकर्षण लुप्त हो गया। वैराग्य की एक चिंगारी प्रज्वलित हो उठी और अगले दिन उनके कदम स्वतः ही उस जिज्ञासा की शांति के लिए घर से निकल पड़े। बड़े सवेरे बिना किसी को कुछ बताए वह घर से निकल पड़े।

वे चलते गए। पूरा दिन चलते रहे। जब कुछ थकावट महसूस हुई तो रुक गए देखा सामने नदी का किनारा है। संध्या बेला थी। शीतल पवन चल रही थी। मन मेँ तरह – तरह की तरंगेँ उठ रही थी। उन्होंने नजरेँ दौड़ाई। चारोँ ओर पहाड़ियाँ थी। घनघोर जंगल था। हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। उस वक्त वे खुद को किस खोज मेँ निमग्न पा रहे थे। वह नदी के किनारे बैठ गये। कैसे आंख लग गई मालूम नहीँ पड़ा। दिन भर की भूख भी विस्मृत हो गई। जब आंख खुली तो देखा सामने एक फकीर बैठा है। सवेरा होने वाला था। ब्रहम् मुहूर्त मेँ फकीर के दर्शन हुए। फकीर ने उनसे अनेक प्रश्न किये – कहाँ से आए हो? कहॉ जाना है… इत्यादि।

फकीर के प्रश्नों से उनके अंतर मेँ एक आवाज से उठी – जानो, यह ब्रहम् क्या है, कहाँ है? फकीर ने उनसे अपने साथ चलने को कहा। वे फकीर के साथ चल पड़े। वे लोग चलते रहे। चलते चलते कुछ दिनोँ बाद वे ऋषिकेश पहुंचे। वहां त्रिवेणी घाट पहुंचकर फकीर ने साथ छोड़ दिया। यह कहते हुए वह चला गया- जो तुम चाहते हो वह तुम्हेँ अवश्य मिलेगा, सत्य की प्राप्ति होगी, ब्रहम् का साक्षात्कार होगा। कुछ उपदेश देकर वे चले गये। ये उपदेश उन्हें बाल अवस्था मेँ कुछ याद रहे कुछ विस्मृत हो गए। तीन दिन – तीन रात वे त्रिवेणी घाट पर ही रहे। माँ गंगा की पावन गोद मेँ सब अच्छा लग रहा था। किसी ने कुछ दे दिया तो खा लिया अन्यथा मौन बैठे रहे। उन तीन दिनोँ मैँ उनके अंदर उथल – पुथल गंगा की लहरोँ की तरह होती रही। घर छोड़ चुके थे। एक फकीर ने हाथ थामा था वह भी छोड़कर चला गया।

1610856_382566825252457_4083371126076102385_n

हजारोँ कोस दूर से चलकर ऋषिकेश पहुंचे थे। घर छोड़े 7 दिन हो चुके थे। उस समय रात्रि के 12 बज रहे थे। उन्होंने गंगा माँ से पूछा – माँ तू तो जगतजननी है। तू तो भटकें को राह दिखाती है। तू तो शास्वत है। अब मेरा क्या ठिकाना है? प्रातः काल हुआ। एक ब्राह्मण उनसे पूछता है – क्योँ, बालक कैसे बैठे हो? वे कोई उत्तर नहीँ दे सके। क्या तुम भूखे हो? फिर वे उनका हाथ पकड़ कर एक आश्रम (ऋषिकेश) ले गये। वहाँ के वयोवृद स्वामी जी के पास ले गये। स्वामी जी ने प्यार के साथ सिर पर हाथ रख कर पूछा – कहाँ से आए हो? वे उनकी बातोँ से काफी संतुष्ट हुए। उन्होंने अपने हाथोँ से उन्हें खिचड़ी खिलायी।

उस दिन से अध्यात्म मार्ग प्रशस्त हो गया। पूज्य स्वामी जी ने उन्हें अपनी शरण मेँ ले लिया और अपनी सेवा मेँ रखा। स्वामी जी प्रातः 3 बजे जाग जाते थे। गंगा – स्नान करते थे। फिर ध्यान – योग मेँ लग जाते थे। वे उनकी सेवा मेँ रहते थे। स्वामी जी के सानिध्य मेँ वे तीन महीने रहे। इस दौरान उंन्होंने बहुत उपदेश दिये। उन्हें ऐसा प्रतीत होता था जैसे कृष्ण अर्जुन को उपदेश दे रहे हों। तीन माह बाद स्वामी जी को बाहर जाना पड़ा। तब प्रबन्धक ने उन्हें आश्रम से चले जाने को कहा। तब वे एक अन्य अाश्रम में पहुंचे। वहां कुछ दिन स्वामी जी महाराज के सानिध्य मेँ रहकर सेवा की।

अब उनके मन में पढ़ने की इच्छा जागृत हुई। तब स्वामी जी ने स्वयं वेद विधालय में प्रवेश दिलाया। वे निरन्तर वेद, कर्मकाण्ड कंठस्थ करने लगे। यहाँ से अध्यात्म का मार्ग विधिवत् खुल गया।संस्कृत महाविधालय से आचार्य आदि की पदवी प्राप्त की। इसके बाद ज्योतिष, तन्त्र – साधना में, ध्यान – योग में एवं अन्य साधनाओं का निरन्तर साधना करते रहे। इसके बाद वे ऋषिकेश से हरिद्वार पहुंचे। हरिद्वार मेँ कुछ आश्रम मेँ रहकर ज्ञान मेँ वृद्धि की। आश्रमों मेँ सेवा – भाव को पनपाया। आज यह सेवा भाव जन – कल्याण का रुप ले चुका है। ज्ञान की उपलब्धि के बाद विदेश – भ्रमण को निकल पड़े। अब तक 98 देशों का भ्रमण कर वैदिक सनातन हिंदू धर्म के प्रचार मेँ निरंतर लगे हुए हैं। धर्म – प्रचार का पावन कार्य सतत् चालू है।

पूज्य सदगुरुदेव श्री 1008 श्रीमत स्वामी श्री सत्य प्रकाशानन्द सरस्वती जी महाराज

पूज्य सदगुरुदेव श्री 1008 श्रीमत स्वामी श्री सत्य प्रकाशानन्द सरस्वती जी महाराज

इन्ही संपूर्ण अद्भुत दिव्यता एवं अल्पा आयु में ही ज्ञान भक्ति एवं वैराग्य देखते हुए पूज्य सदगुरुदेव श्री 1008 श्रीमत स्वामी श्री सत्य प्रकाशानन्द सरस्वती जी महाराज ने सन्यास देने का निर्णय लिया और 11,12,13 जनवरी 2010 में संंयास परंपरागत संयासी दिक्षा प्रदान कर सन्यास परंपरा में गौंरनबित किया। उसी श्रंखला में समाज के कई धार्मिक संगठन में खलबली मच ने लगी। इसके अंतर्गत वैदिक सनातन धर्म के स्तंभ केंद्र दसनामी सन्यास परंपरा के प्रमुख केंद्र पंचायती महानिर्माणी अखाड़ा ने स्वामी जी को महामंडलेश्वर पद पर अभिषेक करने का निर्णय लिया और 14 जनवरी 2010 मकर सक्रांति  के दिन पूज्य स्वामी जी को महामंडलेश्वर पद पर वैदिक सनातन धर्म के परंपरागत समस्त धर्माचार्य, शंकराचार्य, धर्मगुरुओं ने एवं 13 अखाड़ाओं ने निर्णय लिया और स्वामी जी का अभिषेक किया गया।

देश – विदेश में भक्तों की अध्यात्म जिज्ञासा की शांति के लिए एक केंद्र की आवश्यकता महसूस हुई। भक्तों के सहयोग से उनकी प्रेरणा फलीभूत हुई और कनखल में मां गंगा के पावन तट के समीप रामेश्वर आश्रम का निर्माण हो गया। एवं जम्मू-कश्मीर में राम रामेश्वर धाम, सिलीगुड़ी वेस्ट बंगाल में त्रिवेणी संस्कृत विद्यापीठ, हरिद्वार में गौशाला एवं गुजरात नर्मदा  तट पर श्री  रामेश्वर मठ, श्री  वृंदावन में रामेश्वर धाम का निर्माण चल रहा है।

आश्रम में भक्तोँ के रहने के लिए उत्तम आवास की व्यवस्था तो है ही साधना के लिए दिव्य मंदिर एवं  दिव्य इस्टफिक शिवलिंग  भी स्थापित है जो की देश विदेशों से हजारों लोग दिन-प्रतिदिन दर्शन करने आते है। मंदिर मेँ महादेव शंकर, माँ पार्वती, गणेश जी, कार्तिकेय जी, नंदी की भव्य मूर्तियां है। इनके अलावा भगवती दुर्गा, श्री राधाकृष्ण, हनुमान जी के भी दिव्य अर्चा – विग्रह हैँ। मंदिर मेँ प्रातः ब्रह्मवेला मेँ आरती एवं महा रुद्राभिषेक प्रतिदिन विद्वान आचार्यों के द्वारा चल रहा है। सायंकाल संध्या समय आरती, कीर्तन नियमित रूप से होता है। त्यौहारों, विशेष अवसरों पर विशेष पूजा का आयोजन होता है। रामेश्वर आश्रम भक्तों का आश्रय तो है ही ज्ञान का केन्द्र भी है। प्रतिवर्ष हजारों भक्त यहां आते हैँ। माँ गंगा का सानिध्य प्राप्त करते हैँ और अध्यात्म जिज्ञासा शांत करते हैँ एवं दिव्य काम्य प्रयोग के द्वारा, काम्य अनुष्ठानों के द्वारा जन – कल्याण के लिए स्वामी जी ने अपना जीवन समर्पित किया हुआ है। यह कर्मविधि निरंतर चल रही है।

उनकी अध्यात्म यात्रा जारी है…